ब्रह्मा जी द्वारा किए गए सोलह वर्गों का वर्णन

 


1. गृह - जो ग्रह जिस राशि का स्वामी होता है वही उसका गृह होता है।


2. होरा - एक राशि का आधा 15 अंश का एक होरा होता है। अर्थात 12 राशियों में 24 होरा होती है, इसलिए मेषादि राशियों की दो आवृत्ति होती है।

विषम राशि में पहली होरा सूर्य की और दूसरी चंद्रमा की होती है। सम राशि में पहली होरा चंद्रमा की और दूसरी सूर्य की होती है। चंद्रमा के होरा के स्वामी पितर और सूर्य के होरा के स्वामी देवियां होती हैं। 

उदाहरण - जैसे लग्न 9/15/22/57 है, लग्न सम राशि है और 15 अंश से अधिक है, अतः दूसरी होरा सूर्य की है।

इसी प्रकार मेषादि राशियों के प्रथम होरा स्वामी क्रम से सूर्य, चंद्रमा, सूर्य ..... होंगे। और दूसरे होरा के स्वामी प्रथम के विलोम होंगे।


3. द्रेष्काण - एक राशि के तीसरे भाग का अर्थात 10 अंश का एक द्रेष्काण होता है, अर्थात एक राशि में तीन द्रेष्काण होते हैं। 12 राशि में कुल 36 द्रेष्काण होते हैं।

सभी राशियों में 

पहले द्रेष्काण का स्वामी उसी राशि का स्वामी और अधिपति देवर्षि नारद,

 दूसरे द्रेष्काण का स्वामी उस राशि से पांचवीं राशि का स्वामी और अधिपति ऋषि अगस्त,

तीसरे द्रेष्काण का स्वामी उस राशि से नवीं राशि का स्वामी और अधिपति दुर्वासा ऋषि होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है, जो दूसरे द्रेष्काण में है जिसके स्वामी दशवे से पांचवीं राशि वृषभ के स्वामी शुक्र और दूसरे द्रेष्काण के अधिपति ऋषि अगस्त हैं।



4. चतुर्थांश - एक राशि के 7 अंश 30 कला के चार चतुर्थांश होते हैं।

प्रत्येक राशि में उस राशि से प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम राशियों के स्वामी क्रम से चतुर्थांश के स्वामी होते हैं और सर्वदा क्रम से सनक, सनंदन, सनत्कुमार, और सनातन ये अधिपति होते हैं।

उदाहरण लग्न 9/15/22/37 है। इसमें तीसरा चतुर्थांश है, दशवी से सातवीं राशि कर्क के स्वामी चंद्रमा और अधिपति सनत्कुमार हैं।



5. सप्तमांश - एक राशि में 4 अंश 17 कला के सात सप्तमांश होते हैं। विषम राशि में उसी राशि से और सम राशि में उससे सातवीं राशि से सात सप्तमांश के स्वामी होते हैं।
इसके विषम राशि में अधिपति क्षार, क्षीर, दधी, आजय, इक्षुरस, मद्य और शुद्ध जल हैं। और सम राशि में उत्क्रम से अधिपति को देखते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। इसमें तीसरा सप्तमांश है, जिसके पुस्तक अनुसार स्वामी हैं और अधिपति इक्षुरस हैं। मेरे विवेक से चौथा सप्तमांश है जिसके स्वामी दशवे से सातवीं राशि कर्क से गिनने पर तुला के स्वामी शुक्र और अधिपति आज्य हैं।




6. नवांश/नवमांश - एक राशि में 3 अंश 20 कला के नव नवमांश होते हैं। चर राशि में उसी राशि से, स्थिर राशि में उससे नवम राशि से और द्विस्वभाव राशि में उससे पांचवीं राशि से नव राशि तक प्रत्येक राशि 3 अंश 20 कला के तुल्य होती है। क्रम से देवता नर और राक्षस अंशेश होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 में 3 अंश 20 कला के हिसाब से पांचवां नवमांश, वृषभ राशि का हुआ। इसके स्वामी शुक्र और नर अंशेश हुए।


7. दशमांश - एक राशि में दश दशमांश प्रत्येक 3 अंश के होते हैं। यदि विषम राशि लग्न हो तो उसी राशि से और सम राशि हो तो उससे नवीं राशि से दश दशमांश होते हैं। विषम राशि में क्रम से इंद्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, मारुत, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा और अनंत अधिपति होते हैं और सम राशि में उत्क्रम से होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। इसमें तीन अंश के अनुसार छठा दशमांश हुआ। लग्न राशि के सम होने से उससे नवीं राशि कन्या से गिनने से छठी राशि कुंभ के स्वामी शनि का दशमांश हुआ। छठे दशमांश के स्वामी मारुत हुए। 


8. द्वादशांश - एक राशि में 12 द्वादशांश 2 अंश 30 कला के होते हैं। उनके स्वामी की गणना उसी राशि के स्वामी से शुरू होती है। उनके अधिपति क्रम से गणेश, अश्वनी कुमार, यम और अहि (सर्प) होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। यहां 2°/30' के अनुसार सातवां द्वादशांश मकर से गिनने से कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा का है। उसके अधिपति यम हैं।



9. षोडशांश - एक राशि में 1 अंश 52 कला और 30 विकला का 16 षोडशांश होता है। मेषादि राशियों में क्रम से मेष, सिंह और धनु के स्वामी होते हैं। और अधिपति अज(ब्रह्मा), विष्णु, हर और सूर्य होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। इसमें उक्त नियम से नवा षोडशांश धनु राशि के स्वामी बृहस्पति का है। और अधिपति ब्रह्मा हैं।




10. विंशांश - एक राशि में 20 विंशांश 1 अंश 30 कला के होते हैं। चर राशि में मेष से, स्थिर राशि में धनु से और द्विस्वभाव राशि में सिंह राशि से आरंभ करके 20 राशि तक इनके स्वामी होते हैं।

विषम राशि में अधिपति क्रम से काली, गौरी, जया, लक्ष्मी, विजया, विमला, सती, तारा, ज्वालामुखी, श्वेता, ललिता, बगलामुखी, प्रत्यंगिरा, शची, रौद्री, भवानी, वरदा, जया, त्रिपुरा, सुमुखी हैं और 

सम राशि में क्रम से दया, मेधा, छिन्नशीर्षा, पिशाचिनी, धूमावती, बाला, भद्रा, अरुणा, अनला, पिंगला, छुच्छुका, घोरा, वाराही, वैष्णवी, सिता, भुवनेशी, भैरवी, मंगला और अपराजिता होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है अतः ग्यारहवें विंशांश के स्वामी के लिए चर राशि मकर में मेष से ग्यारहवां गिनने पर कुम्भ राशि के स्वामी शनि होंगें। अधिपति पिंगला हुए।



11. चतुर्विंशांश - एक राशि में 1 अंश 15 कला के 24 चतुर्विंशांश होते हैं। विषम राशि लग्न हो तो सिंह से और सम राशि में कर्क से गणना कर 24 राशियों का चतुर्विंशांश स्वामी होता है।

विषम राशि में अधिपति क्रम से स्कन्द, पशुधर, अनल, विश्वकर्मा, भग, मित्र, यम, अंतक, वृषध्वज, गोविंद, मदन, भीम एवं सम राशि में भीम से उत्क्राम रीति से गिनने से अधिपति होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 सम राशि में कर्क से गिनने से 13 वी कर्क राशि यानी चंद्रमा का चतुर्विंशांश हुआ और उसके अधिपति भीम हुए।



12. सप्तविंशांश/ भांश - एक राशि में 27 सप्तविंशांश 1 अंश 6 कला और 40 विकला के होते हैं। प्रत्येक राशियों में क्रम से चर राशि(1,4,7,10) से आरंभ होकर 27 राशि तक स्वामी होते है और उनके अधिपति नक्षत्रेश होते हैं। 

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। इसमें 14 वें सप्तविंशांश के स्वामी सिंह राशि यानी सूर्य होंगे और अधिपति त्वष्टा होंगे।

13.  त्रिंशदंशांश - विषम राशि में मंगल, शनि, बृहस्पति, बुध और शुक्र का क्रम से 5,5,8,7,5 अंश एवं सम राशि में शुक्र, बुध, बृहस्पति, शनि और मंगल का क्रम से 5,7,8,5,5 अंश त्रिशांश होता है।

विषम राशि में क्रम से वह्नि, वायु, इंद्र, धनद और जलद एवं सम राशि में क्रम से जलद, धानाद, इंद्र, वायु और वह्नि अधिपति होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। यह सम राशि है अतः उक्त नियम से बृहस्पति स्वामी होंगे और इंद्र अधिपति होंगे।



14.  चत्वारिंशांश/ खवेदांश - विषम राशि में मेष राशि के स्वामी से और सम राशि में तुला राशि के स्वामी से 45 कला वाले 40 अंशों के स्वामियों की गणना होती है। क्रम से विष्णु, चंद्रमा, मरीचि, त्वष्टा, धाता, शिव, सूर्य, यम, यक्षेश, गंधर्व, काल और वरुण अधिपति होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। उक्त नियम से 21वा अंश खवेदांश हुआ और सम राशि है जिसके स्वामी मिथुन राशि के स्वामी बुध होंगे। एवं यक्षेश अधिपति हुए।



15.  पन्चचत्वारिंशांश/ अक्षवेदांश - चर राशि में मेष से, स्थिर राशि में सिंह से और द्विस्वभाव राशि में धनु राशि से 40 कला वाले अक्षवेदांश के स्वामियों की गणना आरम्भ करना चाहिए। चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशि के क्रम से ब्रह्मा, शंकर, विष्णु; शंकर, विष्णु, ब्रह्मा; विष्णु, ब्रह्मा, शंकर अधिपति होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। 40 कला के हिसाब से 24 वा अक्षवेदांश हुआ, जिसके स्वामी बृहस्पति और विष्णु अधिपति हुए।



16.  षष्ठ्यंश - विषम राशि में 1 घोर, 2 राक्षस, 3 देव, 4 कुबेर, 5 यक्ष, 6 किन्नर, 7 भ्रष्ट, 8 कुलघ्न, 9 गरल, 10 अग्नि, 11 माया, 12 यम(पुरीष), 13 वरुण(अपांपति), 14 इंद्र(मरुत्वान), 15 काल, 16 सर्प(अहिभाग), 17 अमृत, 18 चंद्रमा, 19 मृदु, 20 कोमल, 21 हेरंब, 22 ब्रह्मा, 23 विष्णु, 24 शिव, 25 देव, 26 आर्द्र, 27 कलिनाश, 28 क्षितीश्वर, 29 कमलाकर, 30 गुलिक, 31 मृत्यु, 32 काल, 33 दावाग्नि, 34 घोर, 35 यम, 36 कंटक, 37 सुधा, 38 अमृत, 39 पूर्णचंद्र, 40 विंषदग्ध, 41 कुलनाश, 42 वंशक्षय, 43 उत्पात, 44 काल, 45 सौम्य, 46 कोमल, 47 शीतल, 48 करालदंष्र्ट, 49 इंदुमुख, 50 प्रवीण, 51 कलाग्नि, 52 दंडभृत, 53 निर्मल, 54 सौम्य, 55 क्रूर, 56 अतिशीतल, 57 अमृत, 58 पयोधीश, 59 भ्रमण, 60 इंदुरेखा।

विषम राशि में घोर आदि और सम राशि में इन्दुरेखा आदि क्रम से षष्ठ्यंश के अधिपति होते हैं।

शुभ ग्रह के षष्ठ्यंश में ग्रह हो तो शुभ फल देता है और क्रूर ग्रह के षष्ठ्यंश में हो तो नाश करता है।

जिस ग्रह का षष्ठ्यंश देखना हो उसकी राशि को छोड़कर अंश, कला, विकला आदि को 2 से गुणा कर गुणन फल में 12 से भाग देने पर जो शेष बचे उसमें 1 जोड़कर जो संख्या हो उतनी ही संख्या वाली ग्रह की राशि से उतनी ही संख्या पर जो राशि हो उसके स्वामी षष्ठ्यंश के स्वामी होते हैं।

उदाहरण - लग्न 9/15/22/37 है। इसकी राशि को छोड़कर अंश आदि को 2 से गुणा करने से 30/45/14 हुआ। इसमें 12 से भाग देने पर शेष 6 बचा। इसमें 1 और जोड़ देने से 7वा षष्ठ्यंश हुआ। अतः मकर से 7वीं राशि कर्क के स्वामी चंद्रमा षष्ठ्यंश के स्वामी हुए। दूना किए हुए अंश 30 में 1 जोड़ देने से 31वा सम राशि में गुलीक षष्ठ्यंश के अधिपति हुए।


वर्गभेद

षोडश वर्गों के वर्ग विश्वाबल 



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