सूर्य से शनि पर्यन्त वारों में गुलिक आदि का निरूपण कर रहे हैं। (जिस दिन इनका विचार करना हो उस दिन के) दिनमान में आठ का भाग देने से जो लब्ध हो उतना ही एक खंड का मान होता है; वारेश से (जिस दिन विचार कर रहे हों उस वार से खंडों के अनुसार अपने इष्टकाल तक) गिनने से।
आठवें भाग का स्वामी कोई नहीं होता और शनि का खंड गुलिक होता है। इसी प्रकार रात्रिमान का भी (यदि रात्रि का जन्म हो तो) आठ भाग करके वारेश से पांचवें वार से गिनने से।
आठवें खंड (अंश) का कोई स्वामी नहीं होता है।
शनि का अंश गुलिक
गुरु का अंश यमघण्ट
मंगल का मृत्यु
सूर्य (रवि) का काल
बुध का अर्धप्रहर
उदाहरण - जैसे संवत् 2031 श्रावण कृष्ण त्रयोदशी शनिवार को दिनमान 32/50 है और इसी के बराबर इष्ट काल भी है। इसमें आठ का भाग देने से 4/6/15 यह लब्ध हुई। यहां वारेश शनि से गणना करने से प्रथम खंड ही गुलिक हुआ। इसी को इष्टकाल मानकर सूर्य को स्पष्ट कर लग्न लाने से गुलिक लग्न 4/9/26/25 हुआ।
वार - दिन - रात्रि
रवि - 7 - 3
चंद्र - 6 - 2
मंगल - 5 - 3
बुध - 4 - 7
बृहस्पति - 3 - 6
शुक्र - 2 - 5
शनि - 1 - 4
प्राणपद साधन या जन्म लग्न की शुद्धि
यहां प्राणपद साधन के दो प्रकार दिए हैं -
(1) इष्टकाल के घटी को 4 से गुणा कर एक जगह रख देवें। पलों में 15 का भाग देकर लब्ध को चतुर्गुणित इष्ट घटी में जोड़कर योगफल में 12 का भाग देने से जो शेष बचे, वह प्राण पद की राशि होती है।
शेष बचे हुए फलों को दूना करने से अंश होता है। इस प्रकार से राशि और अंश मध्यम प्राण पद के होते हैं।
इसमें सूर्य की राशि चर - स्थिर - द्विस्वभाव के अनुसार सूर्य की राशि अंश, सूर्य की राशि से नवीं राशि और अंश तथा सूर्य की राशि से पांचवीं राशि और अंश को जोड़ देने से राश्यादि स्पष्ट प्राण पद होता है। ऐसा करने से यदि जन्म लग्न का अंश और प्राण पद का अंश बराबर होता है तो इष्टकाल शुद्ध होता है।
(2) इष्टकाल को पलात्मक बनाकर उसमें 15 का भाग देकर लब्ध राशि और अंश लाकर उसमे (1) में कहे हुए अनुसार सूर्य की राशि के अनुसार राशि और अंश को जोड़ देने से राश्यादि स्पष्ट प्राण पद होता है। ऐसे में जन्म लग्न का अंश और प्राण पद का अंश बराबर होना चाहिए। इस प्रकार से जन्म लग्न को शुद्ध करना चाहिए।
जो जन्मलग्न प्राण पद या गुलिक या चंद्रमा से शुद्ध न की गई हो वह अशुद्ध होती है और वह स्थावर की जन्म लग्न होती है।
इसलिए उससे सप्तम से या उसके अंश से लग्न का संशोधन करना चाहिए। दोनों निर्बल हों तो गुलिक(मांदी) विचार करें।
प्राणपद की राशि से त्रिकोण (1/5/9) राशि में मनुष्यों के जन्मलग्न की राशि होती है।
2,6,10 वीं राशि पशुओं की है।
3/7वीं राशि में चिड़ियों का और शेष राशियों में कीट, सर्प, जल में रहने वाले जीवों का जन्म होता है।
उदाहरण - जैसे संवत् 2013 श्रावण कृष्ण त्रयोदशी शनिवार को इष्ट 32/50 पर लग्न 9/17 में जन्म हुआ। इष्ट कालिक सूर्य 3/17 हैं।
(1) प्रकार से प्राणपद का साधन -
इष्ट घटी × 4 = 32 × 4 = 128
इष्ट पल ÷ 15 = 50 ÷ 15 = 3 शेष 5 128 + 3 = 131
131 ÷ 12 = 10 लब्ध का त्याग कर देने से शेष 11 प्राणपद की राशि और पल शेष को दूना करने से 10 अंश यह मध्यम प्राणपद हुआ। सूर्य चर राशि है अतः सूर्य के राशि अंश में जोड़ने से 11/10° + 3/18/22/28 यह स्पष्ट प्राणपद हुआ।
(2) प्रकार से -
इष्ट काल 32/28/30
इसका पल = 1948/30 इसमें 15 का भाग देने से 129 लब्ध राशि हुई और शेष 13/30 को दूना करने से 27 अंश हुआ। सूर्य को चर राशि में होने से सूर्य में जोड़ देने से
129/27 + 3/18 = 133/15
1/15° यह स्पष्ट प्राणपद हुआ, जिससे "प्राणत्रिकोणे प्रवदन्ति लग्नम" और "लग्नांशप्राणांशपदैक्यता स्यात्" यह सिद्ध होता है।
प्राणपद की राशि मिथुन से जन्म लग्न की राशि तक गिनने से जन्म लग्न की राशि आठवीं आती है। अतः इष्ट शोधन करना आवश्यक है, जिससे दोनों का परस्पर त्रिकोणत्व हो जाए। इसलिए इष्ट काल में 15 पल कम करने से 32/35 इष्ट मानकर उपर्युक्त विधि से प्राणपद बनाने से 1/28 आया। यहां राशि तो ठीक आई, यानी वृष राशि जिससे जन्म लग्न नौवीं राशि है किन्तु लग्नांश और प्राणांश एक नहीं हुए। अतः अतः 6 पल और 30 विपल और घटा देने से इष्टकाल 32/28/30 हुआ। इस पर से प्राणपद बनाने से 1/15 आया, जो कि उक्त वाक्य के अनुसार शुद्ध है।
विशेष - वस्तुतः प्राणपद शब्द का अर्थ है - प्राण देने वाला पद (स्थान) या अंश। यह सूर्योदय से 15 पल मे एक राशि का होता है। अतः तीन दंड में 12 राशि की पूर्ति हो जाती है और 1 पल में 2 अंश प्राणपद का होता है। इस नियम को ध्यान में रखकर इष्ट शुद्ध कर लेना चाहिए। उपर्युक्त शुद्ध किए हुए इष्टकाल द्वारा जन्मांग का स्वरूप निम्नलिखित होगा।
संवत् 2013 शके 1878 श्रावण कृष्ण त्रयोदशी शनिवासरे पुनर्वसुभे प्रथमचरणे इष्टम् 32/28/30 भयातम् 10/32 भभोगः 55/33 लग्नम् 9/15/22/37 शुभम्।
स्पष्ट ग्रह
सूर्य 3/18/26/34
चंद्र 2/22/30/47
मंगल 10/22/32/8
बुध 4/5/22/59
बृहस्पति 4/12/50/54
शुक्र 2/5/3/5
शनि 7/1/48/52
राहु 7/13/27/26।
निषेक (गर्भाधान) लग्न की शुद्धि
सभी जन्मलग्न के ज्ञान से सभी जंतुओं के गर्भाधान लग्न का हुआ हो जाता है।
जिस भाव में शनि हो उस भाव और मान्दि (गुलिक) लग्न का अंतर कर उसमें लग्न और भाग्य भाव के अंतर को जोड़ देने से जो राश्यादि होती है।
जन्म से पूर्व के (निषेक काल के) मासादि का ज्ञान होता है। यदि लग्नेश अदृश्य चक्रार्ध (लग्न से सप्तम के बीच) में हो तो पूर्वोक्त मासादि में चंद्रमा ये भुक्त अंशादि को जोड़ने से मासादि होता है।
इसे जानकर तात्कालिक लग्न को बनावें, वही गर्भाधान की लग्न होती है। उस लग्न से गर्भस्थ प्राणी के शुभ - अशुभ फल कहते हैं।
माता - पिता के जीवन - मरण के शुभ - अशुभ फलों का विचार अपनी कल्पनावश करें।
उदाहरण - जैसे पूर्वोक्त जन्मांग में शनि कर्म भाव की संधि में है, अतः संधि 7/11/58/33 और गुलिक लग्न 4/9/26/35 का अंतर 3/2/31/58 हुआ। इसमें लग्न 9/15/31/5 और भाग्य भाव 5/24/41/25 का अंतर 4/20/51/26 जोड़ देने से 7/23/23/24 अर्थात् जन्म से पूर्व 7 माह 23 दिन 23 घटी 24 पल पूर्व गर्भाधान हुआ था।
भाव लग्न
सूर्योदय से पांच घटी के बराबर एक लग्न बीतती है। इसे भाव लग्न या घटी लग्न कहते हैं।
इसलिए इष्ट घटी पर्यन्त जितनी लग्न बीती हो उसमे यदि जन्म लग्न विषम राशि हो तो सूर्य राशि से और यदि सम राशि में हो तो जन्मलग्न से उक्त संख्या गिनने से जो लग्न हो वही भाव लग्न होती है।
उदाहरण - इष्ट घटी 32/28/30 सूर्य 3/18/26 है। इष्ट घटी में 5 से भाग देने से 6/29/42 लब्ध हुई। इसे सूर्य में जोड़ने से 10/28/8 यह भाव लग्न हुई।
विशेष - इष्टकाल और लग्न की प्रवृत्ति सूर्योदय से होने के कारण सूर्य में ही जोड़ना चाहिए। यह युक्तिसंगत मालूम होता है।
होरा लग्न
जन्म लग्न से ढाई घटी के तुल्य एक लग्न होती है, जिसे होरा लग्न कहते हैं।
अतः इसके अनुसार इष्ट घटी पर्यन्त गिनने से जो उसमे यदि जन्म विषम लग्न में हो तो सूर्य की राशि से अन्यथा जन्म लग्न से गणना करने से जो राशि हो वही होरा लग्न होती है।
उदाहरण - इष्ट घटी 32/28/30 है, इसमें ढाई (5/2) का भाग देने से लब्ध राश्यादि 0/29/42 हुई। इसमें सूर्य की राश्यादि जोड़ने से 4/18/18 यह राश्यादि होरा लग्न हुआ।
घटी लग्न
सूर्योदय से प्रारम्भ कर जन्म समय पर्यन्त क्रम से एक - एक घटी के तुल्य एक राशि के हिसाब से जो राशि हो वही घटी लग्न होती है, ऐसा पूर्वाचार्यों ने कहा है।
इसमें इष्ट घटी के तुल्य राशि होती है और एक पल में दो अंश होते हैं। इसके अनुसार जो राशि और अंश हो उसमे सदा सूर्य के राशि - अंश को जोड़ देने से स्पष्ट घटी लग्न होती है। इसे लग्न मानकर द्वादश भाव चक्र लिखकर जन्म कालिक सूर्य आदि ग्रह जिन - जिन राशियों में हों, उन्हें उन्ही - उन्ही राशियों में देवें।
उदाहरण - इष्ट काल 32/28/30 है और सूर्य 3/18/26 है, उक्त प्रकार से 32 राशि 14 अंश हुआ। इसमें सूर्य के राश्यादि को जोड़ने से 0 राशि 2 अंश यह घटी लग्न हुई।
वर्णद लग्न
(1) जन्म लग्न की राशि और होरा लग्न की राशि संख्या विषम हों तो दोनों का योग करने से यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है।
(2) दोनों सम हों तो दोनों को 12 राशि में घटाकर शेषों का योग करने से यदि विषम राशि हो तो वही वर्णद राशि होती है अथवा,
(3) दोनों में एक विषम हो और दूसरी सम हो तो सम को 12 राशि में घटाकर शेष को पहले में घटाने से शेष वर्णद राशि होती है।
विषम राशि में मेषादि क्रम से और सम राशि में मीनादि से उत्क्रम गणना से है। जो लग्न हो वही वर्णद लग्न होती है। इस प्रकार से सभी भावों की वर्णद लग्न बनानी चाहिए।
विशेष - उपर्युक्त तीनों प्रकारों से यह स्पष्ट है कि योग व अंतर करने से सम राशि आवे तो उसे 12 राशि में पुनः घटा देने से वर्णद राशि होती है अर्थात् वर्णद राशि हमेशा विषम ही होती है।
उदाहरण - जन्मलग्न 9/15/22/37 और होरा लग्न 4/18/18 है। यहां जन्म लग्न सम और होरा लग्न विषम है, अतः नियम (3) के अनुसार जन्म लग्न को 12 राशि में घटाने से शेष 2/14/37/23 हुआ। यही लग्न की वर्णद राशि है।
यदि दोनों विषम या सम राशि हों तो दोनों का योग करने से वर्णद राशि होती है।
एक विषम और दूसरी सम राशि हो तो सम राशि को 12 राशि में घटाने से जो न्यून हो उसे पुनः घटाने से वर्णद होती है।
मेष से क्रम मार्ग से गणना करने से अंतिम राशि पर्यन्त जो राशि आवे वही वर्णद होती है।
सम लग्न में जन्म होने से मीनादि अपसव्य मार्ग से गिनने से लग्न पर्यन्त गणना करनी चाहिए।
यदि दोनों विषम राशि में या दोनों सम राशि में हो तो दोनों के सजातीय होने से दोनों का योग करने से वर्णद दशा होती है।
दोनों विजातीय हों तो पूर्ववत विषम में न्यून को घटाकर मेषादि से सव्य मार्ग से गणना करनी चाहिए।
जो लग्न से अंतिम राशि हो वही वर्णद राशि होती है। वही वर्णद संख्या चरादि क्रम से होती है।
होरा लग्न से आई हुई वर्णद दशा दुर्बल होती है, वहां पर जन्म लग्न से लाई हुई दशा की संख्या लेनी चाहिए।
क्रम - उत्क्रम भेद से पुरुष और स्त्री की दशा होती है। और वर्णद राशि मेषादि और मीनादि से गणना करनी चाहिए।
वर्णद राशि से त्रिकोण में पाप ग्रह की युति हो अथवा पाप ग्रह की राशि हो, उसमें पाप ग्रह की युति हो तो उसके दशा पर्यन्त आयु होती है।
जिस प्रकार रूद्र शूल पर्यन्त आयु होती है उसी प्रकार वर्णद से भी आयु का विचार करना चाहिए।
वर्णद से पांचवीं राशि से पुत्र की, चौथी राशि से माता की, तीसरी राशि से भाई की, ग्यारहवीं राशि से ज्येष्ठ भाई की, नवीं राशि से पिता की आयु का विचार करना चाहिए।
शूल राशि की दशा में उन लोगों को प्रबल आरिष्ट होता है। वर्णद लग्न से लग्न भाव के समान ही सभी बातों का विचार करना चाहिए।
इसी प्रकार लग्न आदि सभी भावों की वर्णद राशि बनाना चाहिए। उसपर से प्रत्येक भावों के शुभ - अशुभ फलों का विचार पूर्ववत करना चाहिए।
ग्रहों की वर्णद राशि नहीं होती है। इस प्रकार वर्णद राशि के दशा का जो वर्ष मिले, उसमें 12 का भाग देकर जैसे चर आदि क्रम - उत्क्रम से अंतर्दशा लिखी जाती है उसी प्रकार यहां भी अंतर्दशा लिखें।
पहले केंद्रस्थ की दशा, इसके बाद पणफरस्थ की और इसके बाद आपोक्लिमस्थ की दशा होती है।
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