वर्गों के भेद

 वर्गों के भेद


षड्वर्ग, सप्तवर्ग, दशवर्ग और षोडशवर्ग होते हैं।


षड्वर्ग में दो - तीन आदि वर्गों के संयोग से किंशुक आदि संज्ञाएं होती हैं। यथा दो वर्ग में ग्रह हो तो किंशुक, तीन के संयोग से व्यंजन, चार के संयोग से चामर, पांच के संयोग से छत्र और छः वर्ग के संयोग से कुंडल नाम होता है।


सप्त वर्ग में छः वर्ग तक तो पूर्वोक्त ही होते हैं, किन्तु सात वर्ग के संयोग से मुकुट होता है।


दश वर्ग में दो वर्ग के संयोग से पारिजात, तीन वर्ग के संयोग से उत्तम, चार वर्ग के संयोग से गोपुर, पांच वर्ग के संयोग से सिंहासन, छः वर्ग के संयोग से पारावत, सात वर्ग के संयोग से देवलोक, आठ वर्ग के संयोग से ब्रह्मलोक, नौ वर्ग के संयोग से शाक्रवाहन और दश वर्ग के संयोग से श्रीधाम योग होता है।


षोडश वर्ग में दो वर्ग संयोग से भेदक, 3 वर्ग के संयोग से कुसुम, चार वर्ग के संयोग से नागपुष्प, पांच वर्ग के संयोग से कंदुक, 6 वर्ग के संयोग से केरल, 7 वर्ग के संयोग से कल्पवृक्ष, आठ वर्ग के संयोग से चंद्रवन, 9 वर्ग के संयोग से पूर्णचंद्र, दश वर्ग के संयोग से उच्चैःश्रवा, ग्यारह वर्ग के संयोग से धन्वन्तरि, बारह वर्ग के संयोग से सूर्यकान्त, तेरह वर्ग के संयोग से विद्रुम, चौदह वर्ग के संयोग से सिंहासन, पंद्रह वर्ग के संयोग से गोलोक, सोलह वर्ग के संयोग से श्रीवल्लभ नाम होता है।


जो ग्रह अपने उच्च राशि में, अपने मूल त्रिकोण राशि में, अपने राशि में और आरूढ़ लग्न से केंद्रपतियों का वर्ग शुभ लेना चाहिए।


जो अस्त हों, युद्ध में पराजित हों, अपने नीच राशि में हों, दुर्बल हों, शयनादि दुष्ट अवस्था में हों तो उनका वर्ग अशुभ होता है।


विशेष - गृह, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश और त्रिंशांश को षड्वर्ग कहते हैं। इनके साथ सप्तमांश को मिला देने से सप्तवर्ग होता है। और इसमें दशमांश, षोडशांश, षष्ठांश को मिला देने से दशवर्ग होता है। शेष षोडशवर्ग होता है।


उदाहरण - पूर्वोक्त उदाहरणों में लग्न सप्त वर्गों में 2 वर्ग में है, अतः किंशुक संज्ञा हुई। दश वर्ग के अनुसार 2 वर्ग में है, अतः पारिजात संज्ञा में है और षोडश वर्ग के अनुसार 4 वर्ग में है, अतः नागपुष्प संज्ञा हुई। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों की संज्ञाएं बनानी चाहिए।


षोडश वर्गों से विचारणीय विषय


गृह / लग्न से शरीर सम्बन्धी शुभ - अशुभ का विचार करना चाहिए।

होरा से द्रव्य का,

द्रेष्काण से भाई का,

चतुर्थांश से भाग्य का,

सप्तमांश से पुत्र - पौत्रादि का,

नवमांश से स्त्री का, 

दशमांश से बड़े कार्यों का (राज सम्बन्धी),

द्वादशांश से माता - पिता का,

षोडशांश से वाहन के सुख - दुख का,

विंशांश से उपासना के विज्ञान का विचार करना चाहिए।

चतुर्विंशांश से विद्या का,

सप्तविंशांश से बलाबल का,

त्रिंशांश से अरिष्ट का,

खवेदांश से शुभ - अशुभ का,

अक्ष वेदांश और षष्ठ्यंश से सभी वस्तुओं का विचार करना चाहिए।


जहां पर (जिस भाव में) क्रूर ग्रह षष्ठ्यंशपति होता है, उस भाव के फलों की हानि होती है, शुभ ग्रह षष्ठ्यंशपति होता है, उस भाव के फलों की वृद्धि होती है। इस प्रकार सोलह वर्गों के भेद होते हैं।

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