नवम भाव में बृहस्पति हो, नवमेश केंद्र में हो और लग्नेश बलवान हो तो बड़ा ही भाग्यवान होता है।
भाग्येश बलवान हो, भाग्य भाव में शुक्र हो लग्न से केंद्र में बृहस्पति हो तो पिता भाग्यवान होता है।
भाग्य भाव से दूसरे या चौथे भाव में मंगल हो और भाग्येश नीच राशि में हो तो पिता निर्धन होता है।
भाग्येश परम - उच्चांश में हो, बृहस्पति भाग्यांश में हो, लग्न से केंद्र में शुक्र हो तो पिता दीर्घायु होता है।
भाग्येश केंद्र में बृहस्पति से देखा जाता हो तो उसका पिता वाहन से युक्त राजा व उसके समान होता है।
भाग्येश कर्म भाव में हो, कर्मेश भाग्य भाव में हो और शुभ ग्रह से किसी प्रकार का संपर्क हो तो उसका पिता धनी और कीर्तिमान होता है।
सूर्य परम - उच्चांश में हो, भाग्येश धन भाव में हो और धनेश भाग्य भाव में हो तो 32वें वर्ष के बाद भाग्य, वाहन और कीर्ति का लाभ होता है।
लग्नेश भाग्य भाव में हो और षष्ठेश भाग्य भाव में हो तो परस्पर पिता - पुत्र में वैर होता है तथा पिता निंदनीय होता है।
यदि निर्बल तृतीयेश कर्मेश से युक्त हो और भाग्येश नीच व अस्त में हो तो जातक भिक्षा से उदर पूर्ति करने वाला होता है।
सूर्य 6/8/12 भाव में हो और अष्टमेश भाग्य भाव में हो तथा व्ययेश लग्न में और षष्ठेश पांचवें भाव में हो तो बालक के जन्म से पूर्व ही पिता की मृत्यु हो जाती है।
आठवें स्थान में सूर्य हो और अष्टमेश भाग्य भाव में हो तो बालक के प्रथम वर्ष में ही पिता की मृत्यु होती है।
व्ययेश भाग्य भाव में, भाग्येश नीचांश में हो तो तीसरे या सोलहवें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
लग्नेश आठवें भाव में और अष्टमेश सूर्य से युत हो तो दूसरे या बारहवें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
भाग्य भाव से आठवें भाव में राहु हो, भाग्य से भाग्य भाव में सूर्य सूर्य राहु से युक्त हो और चंद्रमा से भाग्य भाव में शनि हो तो 7/19 वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
भाग्येश 12वे भाव में और व्ययेश भाग्य भाव में हो तो 44वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
सूर्य के नवांश में चंद्रमा हो और लग्नेश आठवें भाव में हो तो 35/41वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
पितृ स्थान (10) का स्वामी सूर्य हो और शनि - मंगल से युत हो तो 50वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
भाग्य भाव से सातवें भाव में सूर्य हो और भ्रातृ भाव से सातवें भाव में राहु हो तो 6/25 वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
आठवें से सातवें भाव में शनि हो और शनि से सातवें भाव में राहु हो तो 21/26/30 वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है।
भाग्येश नीच राशि में और नीच राशि का स्वामी भाग्य भाव में हो तो 26/33वें वर्ष में पिता की मृत्यु होती है। इस प्रकार से पिता की मृत्यु का विचार कर आदेश देना चाहिए।
भाग्येश से युत शुक्र परम - उच्चांश में हो और मातृ स्थान में शनि हो तो बड़ा भाग्यवान होता है।
भाग्य स्थान में बृहस्पति हो और भाग्येश केंद्र में हो तो 22 वर्ष के बाद भाग्योदय होता है।
बुध परम उच्चांश में हो और भाग्येश भाग्य भाव में हो तो 36वें वर्ष के बाद भाग्योदय होता है।
लग्नेश भाग्य भाव में और भाग्येश लग्न में हो तथा गुरु सप्तम भाव में हो तो धन वाहन से युक्त होता है
भाग्य स्थान से नवम भाव में राहु हो तथा भाग्येश अपनी नीच राशि के आठवें भाव में हो तो जातक भाग्य हीन होता है।
भाग्य स्थान में शनि चंद्रमा के साथ हो और लग्नेश नीच राशि में हो तो भिक्षा का अन्न खाने वाला होता है।
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