द्वादश / व्यय भाव के स्वामी का विभिन्न भावों में फल

 


व्ययेश यदि,

लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक को स्त्री का सुख नहीं होता है। जातक दुर्बल, कफरोगी और धन - विद्या से हीन होता है।


दूसरे या आठवें भाव में हो तो जातक विष्णुभक्त, धार्मिक, प्रिय भाषी और गुणी होता है।


तीसरे या नवम भाव में हो तो जातक अपने शरीर का पोषक, स्त्रीद्वेषी, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही होता है।


चौथे या पांचवें भाव में हो तो जातक पुत्र रहित, महा दुःखी, तीर्थाटन करने वाला, कृपण और रोगी होता है।


छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक पापी, माता के मृत्यु का कारण, क्रोधी, संतान से कष्ट और परस्त्रीगामी होता है।


दशम या एकादश भाव में हो तो जातक पुत्रसुख से हीन, मणि - माणिक्य आदि के होते हुए भी सुख हीन होता है।


जो भावेशों के फल कहे गए हैं वो ग्रहों के बल - अबल के अनुसार ही होते हैं।


ग्रह पूर्ण बली हो तो पूर्ण बल, मध्य बली हो तो आधा फल और हीन बली हो तो चतुर्थांश फल देता है।


इसके बाद नाभासि योग के बारे में पढ़ेंगे।

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