राहु देव की विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या

 राहु देव जन्मसमय में यदि


शयन अवस्था में हों तो जातक अधिक क्लेश से युक्त होता है। किन्तु वृषभ, मिथुन, कन्या या मेष में शयन अवस्था में हो तो जातक धन - धान्य से पूर्ण होता है।


उपवेशन अवस्था में हो तो जातक दाद से पीड़ित, राजा से सम्मानित, अभिमानी, धनसुख से हीन होता है।


नेत्रपाणि अवस्था में हो तो जातक नेत्र रोग से पीड़ित, दुष्ट सर्प, शत्रु और चोर के भय से मुक्त और धन की हानि होती है।


प्रकाश अवस्था में हो तो जातक सुंदर स्थान, सुंदर यश, धन और गुण की उन्नति, राजा से अधिकार की प्राप्ति, नूतन मेघ के समान आकृति और विदेश में उन्नति पाने वाला होता है।


गमन अवस्था में हो तो जातक बहुत संतान वाला, धनी, दाता, पंडित, राजा से पूज्य होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक क्रोधी, बुद्धि तथा धन से हीन, कुटिल, कृपण, कामी होता है।


सभा अवस्था में हो तो जातक पंडित और कृपण, अनेक गुणों से युक्त, धन सुख से युक्त होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक हमेशा शत्रु भय से भयभीत और व्याकुल, बंधुओं से बड़ा विवाद और पतन, धन की हानि, मूर्खता और कृशता होती है।


भोजन अवस्था में हो तो जातक भोजन के बिना विकल, मंदबुद्धि, कार्य में आलसी, स्त्री - पुत्र के सुख से रहित होता है।


नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो जातक महाव्याधि का भय, नेत्र में रोग, शत्रु भय, धन - धर्म का नाश होता है।


कौतुक अवस्था में हो तो जातक स्थानहीन, परस्त्रीगामी और पर धन हरण करने वाला होता है।


निद्रा अवस्था में हो तो जातक गुण- समूह से युक्त, स्त्री - संतान से युक्त, धीर, गर्वीला और अधिक धनी होता है।

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