बृहस्पति देव के विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या

 बृहस्पति देव जन्मसमय पर यदि


शयन अवस्था में हों तो जातक बलवान होते हुए भी हीन शब्द (मंदस्वर), अत्यन्त गौर वर्ण,लंबी दाढ़ी वाला और निरन्तर शत्रु के भय से युक्त होता है।


उपवेशन अवस्था में हो तो जातक वक्ता, अत्यन्त गर्वीला, राजा और शत्रु से संताप पाने वाला, हाथ, जंघा, मुख और पैर में घाव से युक्त होता है।


नेत्रपाणि अवस्था में हो तो जातक रोगी, धन से हीन, गाने - नाचने का प्रेमी, कामी, गौर वर्ण, विजातियों से प्रेम करने वाला होता है।


प्रकाश अवस्था में हो तो जातक गुणों का आंनद,स्वच्छ सुख के समूहों को आंनद, तेजस्वी कृष्णचंद्र के स्थान (वृंदावन) जाने को उद्धत, यदि बृहस्पति उच्च राशि का हो तो संसार में मान्यता और कुबेर के समान धनी होता है।


गमन अवस्था में हो तो जातक साहसी, मित्र वर्ग के सुख से पूर्ण, पंडित, अनेक संपत्तियों से युक्त और वेद को जानने वाला होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक के गृह में जनता, सुंदरी स्त्री और लक्ष्मी (धन) सदा उपस्थित रहता है।


सभा अवस्था में हो तो जातक बृहस्पति के समान वक्ता, सुंदर मोतियों से युक्त, धन, रत्न, हाथी, घोड़ा, रथ आदि सवारियों से युक्त, इंद्र से पूज्य और अनेक विद्याओं को जानने वाला गर्व युक्त होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक संसार में मान - प्रतिष्ठा से युक्त, अनेक वाहन- समूह से युक्त, नौकर, पुत्र, स्त्री, मित्र का सुख, उत्तम विद्या, राजा के समान, अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धि वाला, काब्य प्रेमी, अच्छे मार्ग से चलने वाला और मान - मर्यादा वाला होता है।


भोजन अवस्था में हो तो जातक को निरन्तर सुंदर भोजन मिलता है, कभी भी धन उसका साथ नहीं छोड़ता है। हमेशा घोड़ा, हाथी, रथ आदि सवारियों से घिरा रहता है।


नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो जातक राजा से मान्य, धनी, धर्म को जानने वाला, तंत्र विद्या को जानने वाला, पंडितों से घिरा हुआ श्रेष्ठ पंडित और शब्द शास्त्र (व्याकरण) का पंडित होता है।


कौतुक अवस्था में हो तो जातक कुतूहली, महा धनी, अपने घर में सूर्य के समान तेजस्वी, कृपालु, सुखी, पुत्र, भूमि से युक्त और नीतिमान, महाबली और राज पंडित होता है।


निद्रा अवस्था में हो तो जातक सभी कर्मो में मूर्खता करने वाला, दरिद्रता से युक्त और पुण्य हीन होता है।

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