मंगल के साथ तीसरे भाव के स्वामी त्रिक भावों (6, 8, 12) से भिन्न स्थान में व तीसरे भाव में हो तो भाइयों का सुख होता है।
उपर्युक्त दोनों ही पाप ग्रह से युत हों और त्रिक में हों तो जातक के भाइयों का जन्म होता है, किन्तु बचते नहीं हैं।
यदि भ्रातृ भाव का स्वामी स्त्री ग्रह हो और तीसरे भाव में भी स्त्री ग्रह हो तो जातक को बहने होती हैं। पुरुष ग्रह हों तो भाई होते हैं।
भ्रातृ भाव व भ्रातृ कारक शुभ गृह से युत - दृष्ट हो और भ्रातृ भाव पूर्ण बलवान हो तो भाइयों की वृद्धि होती है।
यदि भ्रातृ भावेश व भ्रातृ कारक केंद्र त्रिकोण में अपने उच्च मित्र आदि स्ववर्ग में हो तो भाइयों का लाभ होता है।
भ्रातृ भावेश चंद्रमा से युक्त हो और भ्रातृ भाव में बुध हो और भ्रातृ कारक शनि से युत हो तो उसके पहले एक बहन होती है। उसके बाद एक भाई होता है और तीसरा मर जाता है। भ्रातृ कारक राहु से युक्त हो और तृतीयेश नीच राशि में हो तो जातक से छोटे भाइयों का अभाव और उससे बड़े तीन भाई होते हैं। भ्रातृ स्थान के स्वामी केंद्र में हों और भ्रातृ कारक उसके त्रिकोण में बृहस्पति के साथ अपनी उच्च राशि में हो तो 12 भाई होते हैं। उसमें दो बड़े, तीसरा, सातवा, नवां और बारहवा मर जाता है। शेष 6 भाई दीर्घ आयु होकर रहते हैं।
व्ययेश से मंगल युत हो व बृहस्पति से युक्त हो और तीसरे भाव में चंद्रमा हो तो सात भाई होते हैं।
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