अष्टम भाव के स्वामी का विभिन्न भावों में फल

 


अष्टमेश यदि,

लग्न या सप्तम भाव में हो तो जातक की दो स्त्रियां होती हैं। सदा विष्णु का द्रोह करने वाला और व्रणरोगी होता है।


धन भाव में हो तो जातक अल्प धन वाला, बाहुबल से हीन और नष्ट हुए द्रव्य को न पाने वाला होता है।


तीसरे भाव में हो तो जातक भ्रातृहीन, बन्धुओं से द्वेष करने वाला, अंगहीन और दुर्बल शरीर का होता है।


चौथे भाव में हो तो जातक कर्म हीन, बन्धु हीन और थोड़ी अवस्था में ही मातृ - पितृ विहीन होता है।


पांचवें या एकादश भाव में हो तो जातक बुद्धिहीन, द्रव्यहीन और मूर्ख होता है।


 छठे या बारहवें भाव में हो तो जातक सदा रोगी, शैशव अवस्था में जल या सर्प भय से पीड़ित होता है।


अष्टम भाव में हो तो जातक की स्त्री दूसरे में आसक्त होती है और वह जुआड़ी, चोर, असत्य बोलने वाला और गुरु की निंदा करने वाला होता है।


नवम भाव में हो तो जातक महापापी, नास्तिक, पुत्रनाशक, वा वंध्या और परस्त्री एवं परधन लोलुप होता है।


दशम भाव में हो तो जातक नीच कर्म में रत, दास कर्म करने वाला, जार से उत्पन्न, क्रूर और मातृ सुख से हीन होता है।

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