केतु देव के विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या

 केतु देव जन्मसमय में यदि


शयन अवस्था में मेष, वृषभ, मिथुन व कन्या राशि में हो तो जातक धनी होता है। अन्य राशि में हो तो रोग की वृद्धि होती है।


उपवेशन अवस्था में हो तो जातक दादरोग की वृद्धि, शत्रु - वायु - राज - सर्प - चोर का भय होता है।


नेत्रपाणि अवस्था में हो तो जातक नेत्र रोग, दुष्ट सर्प आदि का भय, शत्रु तथा राजकुल से भी भय होता है।


प्रकाश अवस्था में हो तो जातक धनी, धार्मिक, नित्य परदेशी, उत्साही, सात्विक और राज सेवक होता है।


गमन अवस्था में हो तो जातक महाधनी, पंडित, गुणी, दाता होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक को अनेक रोग होते हैं। धन का नाश, दंत रोग, महारोग, कृपण, दूसरे की निंदा करने वाला होता है।


सभा अवस्था में हो तो जातक वाचाल, गर्वीला, कृपण, लंपट और धूर्त विद्या का पंडित होता है।


आगम अवस्था में हो तो जातक पाप कर्म करने वालों में श्रेष्ठ, बंधुओं से विवाद रत, दुष्ट और शत्रु तथा रोग से पीड़ित होता है।


भोजन अवस्था में हो तो जातक भूख से पीड़ित, दरिद्र, रोग से संतप्त होकर घूमता है।


नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो जातक व्याधि से विकल, चकाचोध नेत्र वाला, किसी के वश में न होने वाला, धूर्त और अनर्थ कारी होता है।


कौतुक अवस्था में हो तो जातक वेश्या आदि से प्रेम करने वाला, स्थान - भ्रष्ट, दुराचारी और दरिद्र होता है।


निद्रा अवस्था में हो तो जातक को धन - धान्य का बड़ा सुख होता है। अनेक गुणों की चर्चा में समय व्यतीत करने वाला होता है।

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