दशम/ कर्म भाव

 


कर्मेश निर्बल हो तो जातक कर्म हीन होता है। राहु केंद्र - त्रिकोण में हो तो ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ करने वाला होता है।


कर्म और लाभ भाव में पाप ग्रह हो तो जातक दुष्किर्ती पाता है।


कर्मेश राहु से संयुक्त होकर आठवें भाव में हो तो मनुष्यों से द्वेष करने वाला, महामूर्ख और दुष्कर्म में प्रवृत होता है।


कर्मेश शनि - मंगल से युत होकर सप्तम भाव में हो और सप्तमेश पाप ग्रह से युत हो तो जातक शिश्न द्वारा उदरपूर्ति करने वाला होता है।


अपनी उच्च राशि में कर्मेश बृहस्पति से युत हो और भाग्येश कर्म राशि में हो तो जातक मान - ऐश्वर्य से युक्त प्रतापी होता है।


लाभेश कर्म राशि में हो और कर्मेश लग्न में हो अथवा दोनों केंद्र में हो तो सुखी जीवन होता है।


कर्मेश बलवान होकर मीन राशि में बृहस्पति से युत हो तो जातक वस्त्र, आभूषण, सुख आदि से युक्त होता है।


सूर्य लाभ भाव में राहु, मंगल, शनि से युत हो तो जातक कर्म हीन होता है।


मीन राशि में बृहस्पति शुक्र हों, लग्नेश बलवान हो और चंद्रमा अपनी उच्च राशि में हो तो जातक धनी और ज्ञानी होता है।


कर्मेश लाभ भाव में, लग्नेश लग्न में और शुक्र कर्म भाव में हो तो जातक रत्नों से युक्त होता है।


अपनी उच्च राशि में कर्मेश केंद्र - त्रिकोण में और बृहस्पति से युत - दृष्ट हो तो जातक कर्म श्रेष्ठ होता है।


कर्मेश लग्न में लग्नेश के साथ हो, केंद्र - त्रिकोण में चंद्रमा हो तो जातक सत्कर्म में निरत होता है।


कर्म भाव में चंद्रमा हो और कर्मेश उससे त्रिकोण में हो तथा लग्नेश केंद्र में हो तो कीर्ति से युक्त होता है।


लाभेश कर्म भाव में हो और कर्मेश बलवान हो, बृहस्पति से दृष्ट हो तो सत्कीर्ति से युक्त होता है।


कर्मेश भाग्य भाव में और लग्नेश कर्म भाव में हो तथा लग्न से पांचवें भाव में चंद्रमा हो तो जातक विख्यात कीर्ति वाला होता है।


कर्म भाव में शनि नीचराशिस्थ ग्रह से युत हो और कर्मांश में पाप ग्रह हो तो जातक कर्म हीन होता है।


कर्मेश आठवें भाव में हो और कर्म भाव में पाप ग्रह हो तथा कर्म भाव से कर्म स्थान में पाप ग्रह हो तो जातक कर्म हीन होता है।

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