षष्ठम भाव

 


षष्ठेश पाप ग्रह हो और जन्म लग्न वा आठवें वा छठे भाव में स्थित हो तो शरीर में व्रण (घाव) के चिन्ह होते हैं।

इसी प्रकार पिता आदि भावेशों के साथ षष्ठेश से युत होकर छठे या आठवें भाव में हो तो उनके शरीर में भी व्रण (घाव) के चिन्ह कहना चाहिए। सूर्य षष्ठेश हो तो सिर में, चंद्रमा हो तो मुख या कंठ में, मंगल - बुध हों तो नाभि में, बृहस्पति हो तो नाक में, शुक्र हो तो आंख और पैर में, शनि - राहु - केतु हो तो कुक्षि (कोख) में चिन्ह कहना चाहिए।


लग्नेश मंगल या बुध की राशि में होकर कहीं पर बैठा हो तथा बुध से दृष्ट हो तो मुख में रोग होता है।


यदि मंगल या बुध लग्नेश होकर चंद्रमा, शनि या राहु से युत हो तो कुष्ठ रोग होता है।


यदि लग्नेश को छोड़कर चंद्रमा राहु के साथ लग्न में हो तो सफेद कुष्ठ होता है। शनि के साथ हो तो काला कुष्ठ होता है। मंगल के साथ हो तो लाल कुष्ठ होता है।


यदि सूर्य के साथ युत होकर षष्ठेश अष्टमेश लग्न में हों तो ज्वर से उत्पन्न गंडरोग, मंगल से युत हो तो गठिया वा शस्त्र से आघात, बुध से युत हो तो पित्त से उत्पन्न गंड रोग और गुरु से युत हो तो रोग का अभाव, शुक्र से युत हो तो स्त्रीजनित रोग, शनि से युत हो तो वायु जनित गंडरोग, राहु से युत हो तो चांडाल से नाभि में गंडरोग और केतु से युत हो तो भय, चंद्रमा से युत हो तो जल से तथा कफ रोग होता है। इसी प्रकार पिता आदि के भावेशों से उन लोगों के भी रोग का विचार करना चाहिए।


छठे स्थान में पाप ग्रह हो, षष्ठेश पापयुक्त हो, राहु से शनि युत हो तो सर्वदा रोगी होता है। छठे में मंगल हो और षष्ठेश आठवें भाव में हो तो छठे, बारहवें वर्ष में ज्वर रोग से युक्त होता है।


छठे भाव में बृहस्पति हो और बृहस्पति की राशि में चंद्रमा हो तो 22वें, 19वें वर्ष में कुष्ठरोग होता है।


छठे भाव में राहु हो, केंद्र में गुलिक हो, लग्नेश आठवें भाव में हो तो 26वें वर्ष में क्षय रोग होता है।


व्ययेश छठे भाव में हो और षष्ठेश बारहवें भाव में हो तो 30 वें व 29वें वर्ष में गुल्म रोग होता है।


छठे भाव में शनि से युत चंद्रमा हो तो 55वें वर्ष में रक्त कुष्ठ होता है।


लग्नेश लग्न में हो और शनि छठे भाव में हो तो 59वें वर्ष में वात रोग होता है।


अष्टमेश छठे भाव में हो और व्ययेश लग्न में हो, चंद्रमा षष्ठेश से युत हो तो 8वें वर्ष में मृग से भय होता है।


छठे, आठवें भाव में राहु हो, उससे आठवें भाव में शनि हो तो, बालक को 1,2 वर्ष में अग्नि का भय और 3 वर्ष में पक्षि का भय होता है।


छठे, आठवें भाव में सूर्य हो, उससे बारहवें में चंद्रमा हो तो 5,9 वें वर्ष में जल से भय होता है


आठवें भाव में शनि हो, उससे बारहवें भाव में मंगल हो तो 30वें और 10वें वर्ष में चेचक आदि का भय होता है।


अष्टमेश राहु से युत होकर अपने ही अंश में 8/5/9 भाव में हो तो 22/18वें वर्ष में गठिया, प्रमेह आदि से पीड़ा होती है।


लाभेश छठे भाव में हो और षष्ठेश लाभ भाव में हो तो 31/41 वें वर्ष में शत्रु द्वारा द्रव्य का व्यय होता है।


पंचमेश छठे भाव में हो, षष्ठेश बृहस्पति से युत हो और व्यायेश लग्न में हो तो उसका पुत्र शत्रु होता है।


लग्नेश छठे भाव में हो, षष्ठेश षष्ठ भाव में हो तो 10/11वें वर्ष में कुत्ता से भय होता है।

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