प्रथम भाव/तनु भाव/लग्न भाव

 यदि लग्नेश पाप ग्रह चंद्रमा से युत होकर लग्न में हो तो बालक अत्यंत रोगी होता है। यदि वह केंद्र त्रिकोण और लाभ भाव में हो तो रोग का नाश करता है।




लग्नेश /बृहस्पति/शुक्र केंद्र में हो तो जातक धनी, दीर्घायु और राज प्रिय होता है।




जिसके जन्मांग में केंद्र त्रिकोण भाव में पाप ग्रह न हों और लग्नेश तथा बृहस्पति केंद्र में हों तो वह बालक पुण्यकर्ता, अनेक प्रकार के सुखों को भोगने वाला एवं दीर्घायु होता है।




लग्नेश चर राशि में हो तथा शुभ ग्रह से देखा जाता हो तो बालक यशश्वी, धनी, भोगों को भोगने वाला और बलवान होता है।




यदि शुक्र बुध व बृहस्पति चंद्रमा से युत होकर लग्न से केंद्र में गए हों तो बालक राजलक्षण से युक्त होता है।




रवि चंद्रमा एक स्थान में एक ही अंश मे हों तो बालक को तीन मास के अंदर तीन माताएं होती हैं और भाई पिता से जीवित रहता है।




लग्न में राहु हो उस चंद्रमा देखता हो तथा लग्न के नवमांश में शनि - बृहस्पति हों तो यमल बालक होते हैं।









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