ग्रहों की विभिन्न अवस्थाएं
पराशर जी के अनुसार सूर्य आदि ग्रहों की अनेक अवस्थाएं हैं, जिनकी संख्या 16 हैं। उनमें सारभूत प्रधान अवस्थाओं को बता रहा हूं।
तीस अंशात्मक राशि के तीन भाग करके दश - दश अंश के एक - एक भाग का विषम राशि में जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्त अवस्था होती है और सम राशि में विलोम (सुषुप्त, स्वप्न, जाग्रत) अवस्था होती है। परीक्षण से यह निश्चित है कि जाग्रत अवस्था में कार्य सिद्ध होता है। स्वप्न अवस्था मध्यम फल दायक और सुषुप्त अवस्था निष्फल होता है।
दीप्त, स्वस्थ, मुदित, शांत, दीन, अति दुःखी, विकल, खल और कोपी - ये नव अवस्थाएं होती हैं।
जो ग्रह अपनी उच्च राशि में होता है वह दीप्त होता है। ऐसे ग्रह की राशि में पृथ्वी का लाभ, उत्साह, पराक्रम, धन, वाहन, स्त्री - पुत्र का लाभ, शुभ कार्य, बंधुओं से प्रतिष्ठा और राजा से प्रतिष्ठा का लाभ होता है।
जो ग्रह अधि मित्र के गृह में हो तो स्वस्थ होता है। ऐसे ग्रह की दशा में स्वस्थता, राजा से प्राप्त धन आदि का सुख, विद्या, यश, धन - धर्म आदि का लाभ होता है।
जो ग्रह अपने मित्र के गृह में हो तो मुदित होता है। ऐसे ग्रह की दशा में वस्त्र, गंध, तीर्थयात्रा, धैर्य, पुराण आदि का श्रवण, घोड़ा आदि सवारियों का लाभ, आभूषण का लाभ होता है।
शांत की दशा में सुख, धर्म का लाभ, भूमि, स्त्री, सवारी, विद्या का विनोद, धर्मशास्त्र, बहुत धन तथा राजाओं से पूज्य होता है।
जो ग्रह अपने सम के गृह में हो तो दीन होता है। ऐसे ग्रह की दशा में स्थानच्युति, बंधुओं से विरोध, कुत्सित वृत्ति से जीविका, लोगों से त्यागा हुआ और रोग से पीड़ित होता है।
जो ग्रह अपने शत्रु की राशि में हो तो अति दुःखी होता है। ऐसे ग्रह की दशा में अनेक प्रकार के दुखों से युक्त, विदेश यात्रा, बंधुओं से त्याज्य, चोर, अग्नि और राजा से भय होता है।
जो ग्रह किसी पाप ग्रह के साथ हो तो विकल होता है। ऐसे ग्रह की दशा में शरीर में विकलता, मन में विकार, मित्रादिको का मरण, स्त्री, पुत्र, सवारी आदि की पीड़ा होती है।
जो ग्रह किसी पाप ग्रह की राशि में हो तो खल होता है। ऐसे ग्रह की दशा में कलह, वियोग, पिता का वियोग, शत्रु द्वारा जन, धन, भूमि का नाश और अपने ही लोंगों से नित्य निंदा होती है।
जो ग्रह सूर्य के साथ हो तो कोपी होता है। ऐसे ग्रह की दशा में अनेक प्रकार के पाप कर्म, विद्या, धन, स्त्री, पुत्र और बंधुओं का नाश, पुत्रादी को कष्ट और नेत्र रोग होता है।
एक राशि में षष्टांश के तुल्य बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत ये पांच अवस्थाएं होती हैं। बाल साधारण, कुमार में आधा, युवा में कुछ, वृद्ध में सम्पूर्ण और मृत में मृत्यु होती है।
प्रवास, नष्टा, मृत, जय, हास्य, रति, मुद, सदा, भक्त, ज्वर, कंप और स्थिर ये 12 अवस्थाएं होती हैं।
गत नक्षत्र की संख्या को 60 से गुणा कर उसमे नक्षत्र की भुक्त घटी को जोड़कर 4 से गुणा कर उसमें 45 से भाग देवें तो लब्धी तुल्य अवस्था होती है। लब्धि 12 से अधिक हो तो उसमे 12 से भाग देने से शेष गत अवस्था होती है।
अवस्थाओं के नाम के अनुसार ही उनके फल होते हैं।
लज्जित, गर्वित, क्षुधित, तृषित, मुदित, क्षोभित ये 6 ग्रहों की अवस्थाएं होती हैं।
पांचवें भाव में ग्रह राहु, केतु, सूर्य, शनि और मंगल से युक्त हो तो लज्जित होता है। ऐसे ग्रह की दशा में ईश्वर में अनिच्छा, सुंदर बुद्धि की हानि, पुत्र को कष्ट, व्यर्थ भ्रमण, झगड़ा आदि में रुचि और धर्म मे अरुचि होती है।
यदि अपनी उच्च राशि या मूल त्रिकोण में हो तो ग्रह गर्वित होता है। ऐसे ग्रह की दशा में नूतन मकान, बगीचा का सुख, नृपत्व, कला में पटुता, सदा धन का लाभ, व्यवहार में कुशलता, राजगृह में वास और शत्रुओं के समूह का नाश होता है।
शत्रु की राशि में हो, शत्रु से युक्त हो, शत्रु से दृष्ट हो अथवा शनि से युक्त हो तो क्षुधित होता है। ऐसे ग्रह की दशा में शोक, मोह, परिजनों के कष्ट से मानसिक व्यथा, कृशता, शत्रु से विवाद, धन की हानि और विरोध से बुद्धि की हानि होती है।
ग्रह जल राशि में हो, अपने शत्रु से देखा जाता हो, शुभ ग्रह से न देखा जाता हो तो तृषित होता है। ऐसे ग्रह की दशा में स्त्री के संसर्ग से रोग, दुष्ट कार्य का अधिकार, अपने ही लोगों के विवाद से धन की हानि, कृशता, दुष्टों से कष्ट और मानहानि होती है।
यदि ग्रह मित्र के गृह में हो, मित्र से युक्त हो और मित्र से दृष्ट हो और बृहस्पति से युक्त हो तो मुदित होता है।
यदि ग्रह सूर्य से युक्त हो और केवल पाप ग्रह से दृष्ट हो और शत्रु से देखा जाता हो तो क्षोभित होता है। ऐसे ग्रह की दशा में दरिद्रता, दुर्बुद्धी, कष्ट, धन का नाश, पैर में कष्ट, राजा के कोप से धन प्राप्ति में बाधा होती है।
1 शयन, 2 उपवेशन, 3 नेत्रपाणि, 4 प्रकाशन, 5 गमन, 6 आगमन, 7 सभावास, 8 आगम, 9 भोजन, 10 नृत्यलिप्सा, 11 कौतुक, 12 निद्रा ये 12 अवस्था और उनकी चेष्टाओ को कहता हूं।
जिस नक्षत्र में ग्रह हो उसकी संख्या से ग्रह संख्या को गुणा कर दें। गुणनफल को ग्रह की नवांश संख्या से गुणा कर दें। गुणनफल में जन्म नक्षत्र संख्या को जोड़ दें और इसमें इष्ट घटी और लग्न की संख्या को जोड़कर उसमे 12 का भाग देने से शेष के तुल्य शयन आदि अवस्था होती है।
फिर शेषांक को उसी से गुणा कर गुणनफल में नाम के आधक्षर के अनुसार स्वरांक को जोड़ दें और 12 से भाग देवें, शेष में ग्रह का ध्रूवांक जोड़ दें। जैसे सूर्य का 5, चंद्र का 2, मंगल का 2, बुध का 3, बृहस्पति का 5, शुक्र का 3, शनि का 3 और राहु का 4। जोड़ कर 3 का भाग देने से 1 बचे तो दृष्टि, 2 बचे तो चेष्टा और 3 या 0 बचे तो विचेष्टा होती है।
उदाहरण - मान लीजिए सूर्य 3-18-26-14 जन्म नक्षत्र पुनर्वसु, इष्ट घटी 32 और जन्मलग्न मकर है। सूर्य आश्लेषा नक्षत्र में है, उसकी संख्या 9 है, सूर्य की संख्या 1 को गुणा किया तो 9 हुआ, सूर्य की नवांश संख्या 6 से गुणा करने पर 6*9=54 हुआ। इसमें जन्म नक्षत्र संख्या 7, इष्ट घटी 32 और जन्म लग्न संख्या 10 इन तीनों को जोड़ने से 54+7+32+10=103 हुआ। इसमें 12 का भाग देने से शेष 7 बचा, अतः सातवीं सभा अवस्था सूर्य की हुई। फिर शेष को उसी से गुणा करने से 7*7=49 हुआ। इसमें (दिनेश) सूर्य के आद्य अक्षर का स्वरांक 5 जोड़कर 49+5=54 हुआ। इसमें 12 से भाग देने से शेष 6 बचा। इसमें सूर्य के धुवांक 5 जोड़कर तीन का भाग देने से 2 बचा, अतः चेष्टा अवस्था हुई।
दृष्टि में ग्रहों की अवस्था का अल्प फल, चेष्टा में अधिक फल और वि चेष्टा में निष्फल होता है।
ग्रहों का शुभा शुभ और बला बल विचार कर फलादेश करना चाहिए।
ग्रहों की विभिन्न अवस्थाएं के अनुसार विभिन्न भावों में फल
जन्मसमय में
जिन जिन भावों में क्षुधित और क्षोभित ग्रह रहते हैं उन उन भाव के फलों का नाश होता है।
इसी प्रकार सभी भावों का बलाबल के विचार से फल का निर्णय करना चाहिए।
परस्पर मुदित ग्रह हों तो मिश्रित फल होता है। यदि बल हीन ग्रह हो तो हानि, और बली हो तो अधिक फल होता है।
जिसके कर्म भाव में लज्जित या तृषित ग्रह हो अथवा क्षुधित या क्षोभित ग्रह हो तो वह जातक दुःखी होता है।
जिसके पुत्र स्थान में लज्जित ग्रह हो उसके पुत्र का नाश होता है।
जिसके सातवें भाव में क्षोभित व तृषित ग्रह हो तो उसकी स्त्री का नाश होता है।
शयन अवस्था में स्थित शुभ ग्रह जिन - जिन भावों में होता है तो उन - उन भावों के फलों को शुभ कारक होता है।
भोजन अवस्था में गया हुआ पाप ग्रह जिन भावों में होता है उनके फलों का नाश करता है।
निद्रा अवस्था में पाप ग्रह सातवें भाव में हो तो शुभ फल, यदि पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अशुभ फल करता है।
पांचवें भाव में निद्रा या शयन अवस्था में पाप ग्रह हो तो शुभ नहीं होता है।
आठवें भाव में पाप ग्रह निद्रा या शयन अवस्था में हो तो उसकी अप मृत्यु राजा के द्वारा या शत्रु के द्वारा होती है।
यदि पाप ग्रह शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो गंगा नदी में मृत्यु होती है।
कर्म भाव में पाप ग्रह शयन या भोजन अवस्था में हो तो जातक को कर्म से अनेक दुख होते हैं।
दशम भाव में चंद्रमा कौतुक या प्रकाश अवस्था में हो तो राजयोग होता है।
ग्रहों के बल और निर्बलता को देखकर शुभ - अशुभ फलों को बुद्धिमान को जानना चाहिए।

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