चंद्र देव के विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या

 चंद्र देव 

शयन अवस्था में हो तो उसकी दशा में जातक मानी, शीतल स्वभाव, कामी और धन का नाश करने वाला होता है।

उपवेशन अवस्था में हो तो जातक रोगी, मंदबुद्धि, धनहीन, कठोर, कुकर्म में रत, दूसरे के धन को हरण करने वाला होता है।

नेत्रपाणि अवस्था में हो तो जातक महा रोगी, व्यर्थ बोलने वाला, धूर्त और कुकर्म करने वाला होता है।

प्रकाशन अवस्था में हो तो जातक संसार में प्रसिद्ध, अपने गुणों से राजा से द्रव्य प्राप्त करने वाला, हाथी, घोड़ा, लक्ष्मी से युक्त, स्त्री से सुखी और तीर्थयात्री होता है।

गमन अवस्था में कृष्ण पक्ष में हो तो जातक पापी और क्रूर स्वभाव का, नेत्ररोगी और शुक्ल पक्ष में हो तो जातक भयभीत होता है।

आगमन अवस्था में हो तो जातक मानी, चरण में रोग युक्त, गुप्त पाप करने वाला दीन, मलिन और असंतोषी होता है।

सभा अवस्था में हो तो जातक सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ, राजाओं का मान्य, कामदेव के समान सुन्दर, स्त्रियों को सुखदाता, प्रीति के रीति को जानने वाला होता है।

आगम अवस्था में हो तो जातक वक्ता, धर्मात्मा, कृष्ण पक्ष हो तो दो स्त्री वाला, रोगी, दुष्ट और हठी होता है।

भोजन अवस्था में हो तो जातक मान - प्रतिष्ठा वाला, सवारी और सुख से सम्पन्न, स्त्री - पुत्र से सुखी होता है। कृष्ण पक्ष में हो तो जातक का उक्त फल नहीं होता है।

नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो जातक बलवान, गीतज्ञ, रसज्ञ होता है। और कृष्ण पक्ष में पापी होता है।

कौतुक अवस्था में हो तो जातक राजा व धनी, काम कला में कुशल और स्त्रियों का प्रेमी होता है।

निद्रा अवस्था में हो और बृहस्पति से युत हो तो जातक प्रतिष्ठा वान होता है। बृहस्पति से युत न हो, चंद्र क्षीण हो तो स्त्री और संचित धन का नाश और सियारिन उसके घर में उच्च स्वर से रोती है।


Comments