यदि सूर्य देव
शयन अवस्था में हो तो जातक को मंदाग्नि रोग, चरण में स्थूलता, पित्त प्रकोप, गुदा में व्रण तथा ह्रदय मे शूल होता है।
उपवेशन अवस्था में हो तो जातक दरिद्रता को भोगने वाला, कठोर चित्त वाला तथा नष्ट धन वाला होता है।
नेत्रपाणि अवस्था में हो तो जातक सदा आंनद भोगने वाला, विवेकी, परोपकारी, बली, धनी, महासुखी, राजा की कृपा से अभिमानी होता है।
प्रकाशन अवस्था में हो तो जातक उदार चित्त वाला, धन से पूर्ण, सभा में वक्ता, अनेक पुण्य करने वाला, महाबली, सुंदर रूप वाला होता है।
गमन अवस्था में हो तो जातक प्रवास में रहने वाला, दुःखी, सदा आलसी, बुद्धि धन से रहित, भयातुर, क्रोधी होता है।
आगमन अवस्था में हो तो जातक परस्त्री में आसक्त, जनमत से रहित, यात्रा में रुचि, कृपण, दुष्टता में कुशल और मलिन होता है।
सभा अवस्था में हो तो परोपकारी, सदा धन रत्न से परिपूर्ण, गुण का भंडार, भूमि, नूतन वस्त्र, गृह से युक्त, महाबली, अनेक मित्रों से युक्त और कृपालु होता है।
आगम अवस्था में हो तो जातक शत्रुओं से क्षुभित, चंचल, दुष्ट बुद्धि, कृश शरीर, धर्म - कर्म से रहित और उद्धत स्वभाव का होता है।
भोजन अवस्था में हो तो जातक को हमेशा संधियों में वेदना, परस्त्री से द्रव्य की हानि, बल की हानि, असत्य भाषी, शिर में पीड़ा, व्यर्थ अन्न और भोजन करने वाला, व्यर्थ बकवाद करने वाला एवं कुमार्ग गामी होता है।
नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो जातक सदा विज्ञ जनों से आवृत, पंडित, काब्य करने वाला, राजा से पूज्य होता है।
कौतुक अवस्था में हो तो जातक सदा आंनद करने वाला, ज्ञानी, यज्ञ करने वाला, राजगृह में रहने वाला, शत्रु से भयभीत, सुंदर मुख और काव्य करने वाला होता है।
निद्रा अवस्था में हो तो जातक निद्रा से भरे नेत्रों वाला, विदेशी, स्त्री की हानि और अनेक प्रकार से धन का नाशक होता है।
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