शुक्र देव की विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या

शुक्र देव जन्मसमय पर यदि


शयन अवस्था में हों तो जातक बलवान होते हुए भी दंत रोगी, महक्रोधी, निर्धन और स्त्री लंपट होता है।


उपवेशन अवस्था में हो तो जातक नूतन मणि, सुवर्ण के आभूषणों से सुखी, शत्रुओं का नाश करने वाला, राजा से आदर और प्रतिष्ठा में वृद्धि वाला होता है।


नेत्रपाणि अवस्था में लग्न, सप्तम व दशम भाव में हो तो जातक का नेत्र हीनता के कारण धन का नाश होता है, अन्य भाव में हो तो बड़ा मकान होता है।


प्रकाश अवस्था में अपने उच्च, स्वगृह व मित्रगृह में हो तो जातक मतवाले हाथी के समान बलवान, राजा के सदृश धनी, सुखी, काव्य और संगीत में पारंगत होता है।


गमन अवस्था में हो तो जातक की माता नहीं जीती है, मानसिक चिंता, बंधुओं का वियोग और शत्रु से भय होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक महाधनी, तीर्थयात्री, उत्साही और हाथ - पैर के रोग से युक्त होता है।


सभा अवस्था में हो तो जातक की अनायास ही अपने ही प्रताप से राजदरबार मे प्रगल्भता होती है। स्वयं गुणी, शत्रु का नाश करने वाला, महाधनी, दाता और हाथी तथा घोड़े की सवारी पर चलनेवाला होता है।


आगमन अवस्था में हो तो जातक शत्रु द्वारा धन की अधिक हानि, पुत्र, परिजनों का वियोग, रोग का भय एवं स्त्री के सुख की हानि होती है।


भोजन अवस्था में हो तो जातक भूख से व्याकुल, रोग से पीडित और बारम्बार शत्रु से पीड़ित होता है।


नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो जातक काव्य करने वाला, बुद्धिमान, वीणा, मृदंग आदि बाजों को बजाने में चतुर और धन की उन्नति करने वाला होता है।


कौतुक अवस्था में हो तो जातक इंद्र के समान पराक्रमी, सभा में चतुर, उत्तम विद्या और गृह में सदा लक्ष्मी के वास वाला होता है।


निद्रा अवस्था में हो तो जातक दूसरे की सेवा करने वाला, दूसरे की निंदा करने वाला, व्यर्थ बोलने व घूमने वाला होता है।

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