नाभस योग 1800 प्रकार के होते हैं जिनमें से आश्रय योग 3, दल योग 2, आकृति योग 20, और संख्या योग 7 मुख्य हैं।
आश्रय योग - रज्जु, मुशल, नल।
दल योग - माला और सर्प(व्याल)।
आकृति योग - गदा, शकट, श्रृंगा टक, पक्षी, हल, वज्र, यव, कमल, वापी, यूप, शर, शक्ति, दंड, नौका, कूट, छत्र, धनुष, अर्ध चक्र, चक्र, समुद्र।
संख्या योग - वीणा, दाम, पारा, केदार, शूल, युग, गोल।
सभी मिलाकर 32 नाभस योग कहे जाते हैं। इनके लक्षण निम्न लिखित है
यदि सभी ग्रह चर राशि में हो तो रज्जु योग होता है। इस योग मे उत्पन्न पुरुष भ्रमणशील, स्वरूपवान, परदेश में स्वस्थ रहने वाला, क्रूर और खल स्वभाव का होता है।
सभी ग्रह स्थिर राशि में हो तो मुशल योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष मान, ज्ञान, धन, ऐश्वर्य से युक्त, राजा का प्रीत, प्रसिद्ध, अनेक पुत्रो वाला और स्थिर चित्त होता है।
सभी ग्रह द्विस्वभाव राशि में हो तो नल योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष हीन और अधिक अंगों वाला, धन संचय करने वाला, अत्यन्त चतुर, बंधुओं का हितैषी और सुरूप होता है।
यदि किसी भी तीन केंद्रो में शुभ ग्रह हों तो माला योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष नित्य सुखी, वाहन, वस्त्र - अन्न भोग से संपन्न, सुंदर शरीर, अनेक स्त्रियों से युक्त होता है।
यदि किसी भी तीन केंद्रों मे पाप ग्रह हो तो व्याल या सर्प योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष कुटिल, क्रूर, निर्धन, नित्य दुःखी, दीन और दूसरे भक्ष्य भोग से विरत रहने वाला होता है।
यदि सभी ग्रह समीप के दो केंद्रों में हों तो गदा योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष निरन्तर धन के लिए उद्द्योगी, यज्ञ करने वाले, शास्त्र और संगीत में कुशल, धन, सुवर्ण, रत्न से युक्त होते हैं।
सभी ग्रह केवल लग्न और सप्तम में हो तो शकट योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष रोगी, कुनखी, मूर्ख, गाड़ी से जीविका चलाने वाले और मित्र तथा स्वजनों से हीन होते हैं।
यदि सभी ग्रह दशम और चतुर्थ में हो तो विहग या पक्षी योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष भ्रमणशील, परतंत्र, दूत, सूरत से जीविका चलाने वाले, ढीठ और झगड़ालू होते हैं।
सभी ग्रह लग्न, नवम और पांचवें भाव में हो तो श्रृंगाटक योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष कलहप्रिय, झगड़ालू, सुखी, राजा के प्रिय, सुंदर स्त्रियों से युक्त और स्त्रियों से द्वेष करने वाले होते हैं।
सभी ग्रह 2, 6, 10, 3, 7, 11, 4, 8, 12 में हों तो हल नाम का योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष बाहुभोजी, दरिद्र, कृषि करने वाले, दुःखी, उद्वेग से युक्त, बंधु तथा मित्रों में आसक्त और दास होते हैं।
शुभ ग्रह लग्न और सप्तम भाव में हो और पापग्रह दशम और चतुर्थ भाव में हो तो वज्र योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष आदि और अंत अर्थात बाल्य और वृद्ध अवस्था में सुखी, शूर, सुंदर, निर्दय और भाग्यहीन होते हैं।
वज्र योग के विपरीत हो तो यव योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष व्रत, नियम, मंगल को करने वाले, आयुष्य के मध्य में सुख, धन, पुत्र से युक्त, दाता और स्थिर चित्त होते हैं।
और यदि सभी केंद्रों में मिश्रित शुभ - पाप ग्रह बैठे हों तो कमल योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष धन - ऐश्वर्य एवं गुणों से युक्त, दीर्घायु, अत्यन्त कीर्तिमान, सैकड़ों शुभ कार्य करने वाले राजा होते हैं।
यदि केंद्र से भिन्न स्थान (पणफर) में सभी ग्रह हो तो वापी योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष धन संग्रह में चतुर, स्थिर धन और संपत्ति से युक्त, पुत्रवान, नेत्र को सुख देने वाले पदार्थो से युक्त राजा होते हैं।
सभी ग्रह लग्न से चौथे भाव के अंदर ही हों तो यूप योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष ज्ञानी, यज्ञ कर्ता, स्त्री से युत, सत्व युक्त, व्रत नियम में संप्रिक्त और विशिष्ट होता है।
सभी ग्रह लग्न से चौथे से सप्तम के अंदर हो तो शर योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष बाण बनाने वाले, आखेट के धन से सुखी, मांस खाने वाले, हिंसक, कुत्सित शिल्प करने वाले होते हैं।
सभी ग्रह सप्तम से दशम के अंदर होता है तो शक्ति योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष दरिद्र, निष्फल, दुःखी, नीच, आलसी, दीर्घ जीवी, झगड़ालू वृद्धि और निपुण होते हैं।
सभी ग्रह दशम से लग्न के अंदर होता है हो दंड योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष स्त्री - पुत्र से हीन, निर्धन, निर्लज्ज, अपने स्वजनों से त्यक्त, दुःखी और नीच लोगों के दास होते हैं।
सभी ग्रह लग्न से सातवें भाव के अंदर हों तो नौका योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष जल से उत्पन्न पदार्थो से जीविका वाले, बहुत भोजन करने वाले, प्रसिद्ध कीर्ति वाले, दुष्ट, कृपण, मलिन, और लोभी होते हैं।
सभी ग्रह चतुर्थ से दशम भाव के अंदर सात घरों में हो तो कूट योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष झूठ बोलने वाले, पापी, वधिक, धूर्त, क्रूर, नित्य झूठे व्यापार वाले, पहाड़ और जंगलों में रहने वाले होते हैं।
सभी ग्रह सप्तम से लग्न पर्यन्त सात भावों में हो तो छत्र योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष अपने जनों को आश्रय देने वाले, दयावान, अनेक राजाओं का प्रिय, उत्तम बुद्धि से युक्त, प्रथम और अंतिम अवस्था में सुखी, दीर्घायु होते हैं।
सभी ग्रह दशम से चतुर्थ भाव के अंदर सात घरों में हो तो चाप योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष झूठ बोलने वाले, जेलखाने के मालिक, चोर, धूर्त, जंगल के प्रेमी, भाग्य हीन और अवस्था के मध्य में सुखी होते हैं।
सभी ग्रह पंचम से नवम भाव के अंदर पांच भावों में हो तो अर्धचंद्र योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष सुंदर शरीर के, सेनापति, राजा के प्रिय, बली, मणि, सुवर्ण और आभूषणों से युक्त होते हैं।
उपर्युक्त योगों के अभाव में निम्नलिखित योग होते हैं।
यदि सभी ग्रह एक ही राशि में हों तो गोल योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष बलवान, निर्धन, विद्या से हीन, मलिन, हमेशा दुःखी और दीन होते हैं।
यदि सभी ग्रह दो भावों में हो तो युग योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष पाखंडी, निर्धन, लोक में बहिष्कृत, पुत्र - माता के धर्म से हीन होते हैं।
यदि सभी ग्रह तीन भावों मे हो तो शूल योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष बड़े आलसी, निर्धन, हिंसक, जाति बहिष्कृत, शूरवीर, संग्राम में लब्ध कीर्ति वाले होते हैं।
यदि सभी ग्रह चार भावों मे हो तो केदार योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष बहुतों के उपकारी, कृषि कर्ता, सत्यवादी, सुखी, चंचल और धनी होते हैं।
यदि सभी ग्रह पांच राशियों में हो तो पाश योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष बंधन को भोगने वाले, कार्य में चतुर, प्रपंची, बहुत बोलने वाले, दुःशील और अनेक नौकरों से युक्त तथा परिवार वाले होते हैं।
यदि सभी ग्रह छः राशियों में हो तो दामिनी योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष नीति और धन से युक्त, प्रभु, प्रसिद्ध, अनेक पुत्र, रत्न से समृद्ध और धीर तथा पंडित होता है।
यदि सभी ग्रह सात राशियों में हो तो वीणा नामक योग होता है। इसमें उत्पन्न पुरुष गीत, नाच और बाजा के प्रेमी, निपुण, सुखी, धनी, नेता, अनेक नौकरों वाले होते हैं।
चक्र योग में उत्पन्न पुरुष अनेक राजाओं के रत्न जड़ित मुकुटों से नमस्कार किए जाने वाले राजा होते हैं।
समुद्र योग में उत्पन्न पुरुष अनेक रत्न एवं धन से समृद्ध, भोग युक्त, जनप्रिय, पुत्रवान, स्थिर धन वाले और सज्जन होते हैं।
नोट - इन योगों का फल सभी ग्रहों की दशा में होता है, यह पूर्वजों का निर्णय है।
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